चिंतन: तालिबान पर अरशद मदनी के ब्यान से राष्ट्रवादी मूल्यों को मजबूती

तालिबान—लड़ाकों द्वारा गठबंधन सेनाओं के खिलाफ 20 साल का युद्ध लड़ने के पश्चात एकाएक सत्ता पाना सोच से परे की बात है। इस प्रकार घटनाक्रम में एकदम मोड़ आ जाना इतना नाटकीय था कि सभी स्तब्ध रह गए। कई विश्लेषक नए तालिबान को आधुनिक, बेहतर तथा पुराने तालिबानियों से बहुत कम संबंध रखने वालों के तौर पर पेश कर रहे हैं। बहरहाल, वैचारिक प्रतिबद्धता एवं राजनैतिक संरचना में स्थिरता लाने के लिए हमारी सोच से अधिक समय लग सकता है। चूंकि, तालिबानियों द्वारा पिछले समय में इतनी सख्ती लागू की गई थी कि यह मानना मुश्किल लगता है कि अब वें बदल चुके हैं। इस बात को इस सच्चाई से भी मजबूती मिलती है कि यहां रहने वाले लोग इस देश को छोड़ने पर उतावले हैं। कई अफ़गानी गली—कूचों से निकलकर अपने राष्ट्रीय झण्डे को बचाने के लिए उतारू हैं। यहां की औरतें अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं और ​विदेशी सरकारें अपने दूतावास में कार्य करने वाले कर्मचारियों व राजनयिकों को निकालने में व्यस्त हैं।
अरशद मदनी, जो जमीयत उलेमा हिंद (अरशद) के अध्यक्ष हैं, और दारूल—उलूम—देवबंद में पढ़ने वाले छात्रों के लिए पितातुल्य हैं, ने हाल ही में कहा था कि ‘तालिबानियों को उसी सूरत में देवबंद का समर्थन मिलेगा जब वें शांति, न्याय और अफ़गानिस्तान में ऐसा सही वातावरण पैदा करने में अपनी प्रतिबद्धता दिखायेंगे व वहां रहने वाले लोग अपने आपको सुरक्षित महसूस करेंगे।’ दारूल—उलूम—देवबंद ने हमेशा से यह कहा है कि वें राजनैतिक दायरे को लांघने में यक़ीन नही करते। उनका भारतीय धर्मनिरपेक्षवाद में व इसकी ‘मिश्रित—संस्कृति के प्रति अटूट सम्मान है। दारूल—उलूम ने सदा ही आतंकवाद को नकारा है और यह दावा किया है कि आतंकवाद इस्लाम के विरूद्ध है। उनके अनुसार ‘आतंकवाद और मासूमों की हत्या करना इस्लाम के विरूद्ध है। यह प्यार और शांति का धर्म है ना कि हिंसा का।’
नीति विश्लेषक इस बात से चिंतित हो रहे हैं कि तालिबान 2.0 एक ‘स्टेट एक्टर’ के तौर पर किस प्रकार व्यवहार करेगा और राजकीय मामलों को चलाने में ‘धर्म’ का क्या रोल होगा। मौजूदा तालिबानी अधिक परिपक्व, पढ़े लिखे और अपने कार्यकलापों के प्रति अधिक सजग दिखते हैं और उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुसार कार्य करने का इशारा भी किया है। बहरहाल, यह दिखता है कि ‘धर्म’ अब भी उनके मार्गदर्शन में अहम रोल अदा करेगा। एक दिलचस्प पहलू यह देखना होगा कि तालिबानियों तथा देवबंदी विचारधारा को मानने वालों के बीच किस प्रकार का संबंध स्थापित हो पायेगा। तालिबानियों के उत्थान के बाद इन धार्मिक संस्थानों की स्थिति को लेकर एक बहस सी छिड़ी हुई है। कुछ विश्लेषकों का ऐसा विश्वास है कि यें संस्थान तालिबानियों को मजबूत बनने में सहायक सिद्ध हो सकते हैं।
तालिबानियों का विषय निश्चित ही दारूल—उलूम देवबंद के दायरे से परे है जिसने हमेशा ही स्वयं को आतंकवादी व कट्टरवादी संगठनों से एक फ़ासले पर रखने की कोशिश की है। कुछ प्रेक्षकों की इस बात में रूचि है कि तालिबानियों के दोबारा सिर उठाने पर, देवबंद के उलेमा किस प्रकार अपनी प्रतिक्रिया देंगे। दारूल—उलूम अच्छी तरह से यह बात समझता है कि तालिबानियों का उत्थान उन्हें प्रभावित करता है और इस पर किसी भी प्रकार का ब्यान देना विवादों को आमंत्रण देने जैसा होगा। इस सबसे बावजूद, तालिबानियों का उत्थान अंतर्राष्ट्रीय समुदाय व क्षेत्रीय पड़ौसियों के लिए चिंता का विषय है। देवबंद जैसे धार्मिक संस्थान शिक्षा के प्रसार पर ध्यान देंगे और विवादों से बचने की कोशिश करेंगे। अब इसका इंतजार करना होगा कि क्या तालिबानियों द्वारा अपनाई जा रही सख्ती पर दारूल उलूम के उलेमा कोई ब्यान देंगे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *